Thursday, 3 January 2013

तुम भला क्या जान पाओगे ?


तवे पे सिकती हुई रोटियों की महक
भूख को कैसे बढाते हैं ?
कर्कटों में घुमते पीठ पर थैला लिए,
एक टुकड़ा प्लास्टिक का
बेकलों की आँख में,
उम्मीद के, कौन से सपने जागते हैं

तुम भला क्या जान पाओगे?

बादलों को देखकर झूमते हैं मोर
और गीत गाते हैं पपीहे,
और तुम भी तो,
मेघ और मल्हार के उत्सव मनाते हो !
चरमराती झुग्गियों
और फरफराती पन्नियों को देखकर
वे बेचारे रात भर,
किस तरह से सिहर जाते हैं ?

तुम भला क्या जान पाओगे ?!

करो तुम बाते बड़ी
अहले वतन की,
मान की
अभिमान की
अगरु चन्दन मान लो
धूल तुम अपने धरा की
बिन दवा बिन दूध के,
गोद में मरते हुए,
मौत से लड़ते हुए,
आंसुओं को रोकते,
पुतलियों का पत्थरों में बदल जाना

तुम भला क्या जान पाओगे?
-मृदुला शुक्ला

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