Sunday, 6 January 2013

आग

ज्वाला मुखी की
'आग'
कब बनना चाहा मैंने?
विध्वंस ही तो प्रतिबिंबित होता है|

यज्ञ की लपटे,
गिरती हुई समिधा के साथ ही,
तो ऊपर उठती हैं |
कभी पवित्र क्यों नहीं लगती मुझे ?
आसपास बैठे यज्ञोपवीतधारी पुरोहित,
अपनी आवाज़ ऊंची कर ,
एक दुसरे की आवाज़े दबाते हुए से लगते हैं मुझे|

और सूरज क्या बनना?
जिसे उगते समय ही तो अर्घ मिलता है,
वो भी भयवश|

और सप्तपदी की आग
वो भी कब बनना चाहती हूँ मैं?
किसने निभाई?
आजतक,
इसके इर्द गिर्द ली गयी कसमे|

मैं तो बनना चाहती हूँ-
राख के नीचे दहकता हुआ गोबर का उपला,
जिसे शाम के धुंधलके में,
कलछुल में माँगा जाता रहा है
हज़ारों हज़ार बरस,
जिसने भूख मिटाई है
सदियों तक
सभ्यता की|
चुप चाप !!!

-मृदुला शुक्ला

1 comment:

  1. मैं तो बनना चाहती हूँ-
    राख के नीचे दहकता हुआ गोबर का उपला,
    जिसे शाम के धुंधलके में,
    कलछुल में माँगा जाता रहा है
    हज़ारों हज़ार बरस,
    जिसने भूख मिटाई है
    सदियों तक
    सभ्यता की|
    चुप चाप !!! wah wah

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