Tuesday, 26 March 2013

सीमा प्रहरी


"पहाड़"

जब नहीं छिड़ी होती जंग सरहदों पर
तब भी तो जूझते रहते हो तुम
लड़ते रहते हो अनेको जंग भीतर और बाहर
जब पड़ रही होती है बाहर भयानक बर्फ
सीने में धधकता सा रहता है कुछ

और रेत के बवंडरों में मन में उमड़ घुमड़
बरसता सा रहता है कुछ
जाने कैसे निभाते हो कई- कई मौसम एक साथ........

विषम परिस्थतियों में सरहदों रह रहे रणबांकुरों को सादर समर्पित .........
पहाड़
तुम्हारे घर जैसे मकान के पीछे
दूर पहाड़ों के पीछे जो बर्फ गिरी है
वो अब तक ठंडी महकती खूबसूरती
का भ्रम थी मेरे लिए

उसे देख कविता के बीज पड़ते थे मेरे भीतर
उसके सन्नाटे मेरे भीतर बजते थे
अनहद नाद की तरह
तब बर्फ का मतलब मेरे लिए
शुचिता पवित्रता अनछुआ भोलापन था
ओह...............................
आज देखी मैंने उसके भीतर धधकती
कुछ सीमा प्रहरियों के अकेलेपन की आग
अचानक देखा दूर पहाड़ों पर उठता धुंआ
और उसमे डूबती तुम्हारी
बोझिल शाम और अकेली उदास रात
उस आग मैं झुलसते देखी
तमाम छोटी बड़ी ख्वाहिशें
तुम्हारी खुद की
और तुम्हारे अपनों
लेकिन तुम्हे जलाए रखनी होगी ये आग ......
क्यूंकि इस आग मैं पकते है
एक मुल्क की मीठी नींद के सपने ........


"रेगिस्तान"

मन तो भागता होगा तुम्हारा
रेतके बवंडरों के पीछे                                                          


थाम लेने को महबूब का दामन समझ
दूर बहुत दूर जब दिखता होगा कोई नखलिस्तान
तो तुम तब्दील हो जाते होगे
रेगिस्तान के जहाज में
तुम भर लेते होगे ठंडक अपनी आँखों में ,महीनो के लिए
और ओढ़ लेते होगे हरियाली को माँ का आँचल समझ

जब नहीं आती चिट्ठियां तार संदेशे
तो फिर बनाते हो कालिदास के मेघों को दूत
मगर सुना है की रेगिस्तानो मैं बादल भी कभी
भूल कर ही जाते हैं

दग्ध रेत के जंगलों मैं जब उदास होते हो
तो रेत ने कहा तो जरुर होगा तुमसे ?
रेगिस्तान मैं रहना है तो जियो रेत बनकर

दिन भर तप कर भी वो कहाँ रखती है मन में ताप
शाम के धुंधलके से ही बादलों को लौटा सारी गर्मी
खिल जाती है रेत चांदनी रातों की शीतलता सी

जानती हूँ !
तृप्ति की तलाश में दग्ध हो तुम
मगर जलना होगा तुम्हे .............
क्यूंकि इसी आग मैं पकते हैं एक मुल्क
की मीठी नींद के सपने



"सागर "

थाह लेते हो अथाह समुंदर की
बस नहीं ले पाते खुद के मन की
बाहर जीत जाते हो जल दस्सुयों से
लेकिन अकसर हार जाते हो
भीतर की लड़ाई
बस दिखती नहीं वो हार                                                   


सपने कतरा कतरा बहते हैं समुंदर में
आँखों और समुंदर का पानी एक सा ही खारा होता हैं

जब नहीं शामिल हो पाते अपनी खुद की खुशियों में
तो समुंदर की लहरों के संगीत में ही सुन लेते हो
जचकी के ढोलकों की थाप बहन की विदाई की शहनाई

बाडवानल सुना है पढ़ा भी है
मगर भला पानी में भी कभी आग लगती है?
मगर ................
अक्सर तुम्हे देखा है बीच समुंदर में
झुलसते भावनाओं के बाडवानल में

लेकिन हे वीर !
झुलसना ही होगा तुम्हे इस आग में

 क्यूंकि इसी आग में पकते हैं एक मुल्क
की मीठी नींद के सपने




" जंगल "

भीतर उमड़ घुमड़ बरसता है मन
और बाहर बढ़ जाती है उमस
बचपन मैं भागते वक्त तितलियों के पीछे
पकड लेते थे तुम कई कीट पतंगे
और हथेलियों पर लेकर कर घूमते थे मकड़ियां
दादी के कहे के यकीन पर
की अब मुझे मिलेंगे नए कपडे
मगर सुनो है की इन जंगलों मैं जहरीले होते हैं कीट पतंगे
और वो बचपन की नए कपडे वाली मकड़ियां

तुम घिर जाते हो अचानक
एक अनजानी हरियाली से
हर पत्ता तो अनचीन्हा सा लगता है                    



अकेले मैं जिन्दगी तपती है
जेठ की दुपहरी सी
बियाबान में साफ़ दिखती हैं पगडंडिया
मगर बरसते ही बादलों के
खो जाते हैं तमाम रस्ते और
उनमे बढ़ जाते हैं सांप और बिच्छू

तुम कहाँ समझ पाते हो
की ताप भीतर ज्यादा है या बाहर
नमी मौसम मैं ज्यादा है या आँखों में
मत समझो इसे ,बस तपते रहो
क्यूंकि तुम्हारे ताप की
आग में पकते हैं एक मुल्क की मीठी नींद के सपने 



                                                                                       -मृदुला शुक्ला

1 comment:

  1. i can see myself in this... thanx a lot mam

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