Tuesday, 26 March 2013

फागुन

सुना है इस शहर मैं हर साल
इसी मौसम में एक जोगी आता है
 इस शहर के लोग उसे फागुन सा कुछ कहते हैं

फागुन के आते ही इस शहर को कुछ हो जाता है
गाड़ियों से निकलते हैं गुलाबी धुवें
मोटरों की हॉर्न फाग गाती सी लगती है

वो धुप जो कुछ दिन पहले बालकनियों में
मरियल कुत्ते सी कूँ कूँ करती थी
आसमान की कनपटी पर गुलाबी होकर बिखर जाती है
आँखे तो देखो इसकी कैसी सुर्ख हो रक्खी है
अरे !
समझाओ इसे कोई फागुन को गुलाबी रंग ही फबता है
और देखो इन दरख्तों को अभी अभी तो उतारें हैं धूसर कपडे
और अब देखो हरे रंग मैं इतराते से हैं

मैं हर रोज ढूंढती हूँ फागुन को, मिल जाए कहीं
तो कस कर पकड़ लूं कलाई उसकी
वो दिखता नहीं गुम है इस शहर के हुजूम में कहीं

मैं चाहती  हूँ की वो ठहर जाए इस शहर में  कहीं
वर्ना जब वो जाता है  तो ले  जाता है
सारे रंग और कहकहे सब के होंठो से
और छोड़ जाता है सलेटी धुंवे मैं डूबा आसमान
सिले हुए होंठो के लोंगो से अटे रस्ते

और फिर शहर अकेला इंतज़ार करता है अगले  साल फागुन का
                                                                                                                -मृदुला शुक्ला

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