Tuesday, 2 April 2013

प्रेम

मैं अक्सर
किसी न किसी के
प्रेम में
पड़ जाती हूँ
और फिर
काफी दिनों तक
रहती भी हूँ प्रेम में

मुझे याद है
मेरा पहला प्रेम
मैंने उसे
गली के मुहाने पर
पहली बार देखा था
कुछ सात एक साल की थी
उसके पंजो से खून रिस रहा था
वह ठंड से कांप रहा था
मैंने उसे गोद में उठाया
और घर ले आई

कोहराम सा
मच गया घर में
सबने यूँ हिकारत से
देखा मझे
जैसे कोई
घर से
भागी हुई लड़की
अपने प्रेमी के साथ
घर लौट आई हो
फिर सब कुछ वैसा ही हुआ था
जैसा प्रेम में होता है
दिन भर सोचते रहना
उसी के बारे में
अकेले में सोच कर
मुस्कुरा देना
उसके लिए सबसे लड़ना
और फिर  झूठ बोलना
(तब मैंने झूठ बोलना सीखना शुरू ही किया था)
एक नाम भी रखा था उसका मैंने
हिंदी में ही था
तब कुत्तो के अंग्रेजी नाम
कम हुआ करते थे
टी बी वाली बुआ के
अलग किये गए बिस्तरों
में से चुराकर
एक कम्बल
मैंने बना दिया था उसका एक बिस्तर
और फिर वो सोता रहता था
और मैं रात भर
उठ उठ कर उसे देखती रहती थी


दूसरा प्यार भी मुझे
उसी गली पर बैठे
एक अधनंगे पागल के साथ हुआ
जो हर पेपर को उठा कर
हर आने जाने वाले से
कहता था
'वकील साहब मिली ग हमरे रगिस्ट्री क पेपर'
तब तक मैंने पक्का वाला
जूठ बोलना सीख लिया था
माँ को कहती थी
की कितनी भूख लगती है मझे
सुर तुम टिफिन में देती हो
बस दो पराठे?
माँ को क्या पता था
की एक पराठा तो मैं
गली वाले पागल के लिए
बचा कर ले जाती थी
जिससे अभी अभी
मझे प्रेम हुआ था

फिर एक दिन खली था
गली का मुहाना
और कम्बल चुराकर
बनाया गया बिस्तर

देखो तब से आज तक
मैं बार बार पड़ जाती हूँ
प्रेम में ये जानते हुए
की होशो हवाश में रहने वाला आदमी
पागल और कुत्ते से तो कम ही वफादार होगा

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