Monday, 22 April 2013

खबर

सुबह तो लपक कर पकड़ते हो तुम हमें
और फिर सबसे पहले मिलती
भी उसे हूँ जो
पावरफुल हो घर में
रिटायर्ड बुजूर्ग ताकते हैं अपनी बारी को
इस उलाहने के साथ
की कौन सा तुम्हे ऑफिस जाना है

कई बार मुझे होठों मैं बुदबुदा कर पढ़ा जाता है
तो कई बार चटखारे लेकर जोर जोरसे
पड़ोसियों को भी कभी कभी सुनना पड़ता है अनचाहे
मुझे अगर मुझे में ताने जैसा मसाला हुआ तो

जितनी मसालेदार हुई
पढ़ी भी जाती हूँ उतने उच्च स्वर मैं

अरे अखबार की
खबर हूँ मैं !
मगर शाम होते ही हो जाती हूँ बासी
फिर एक दिन बेच दी जाती हूँ
कबाड़ी के हाथ कबाड़ के भाव
और रीसाइक्लिंग मैं बिखर जाता है रेशा रेशा मेरा

और आज फिर देखो मैं आ गयी पुनर्जन्म लेकर
अरे हम ख़बरें भी मरती हैं क्या भला
हम तो बस बदल लेती हैं अखबार
मृदुला शुक्ला

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