Monday, 22 April 2013

अजनबियत...

कल अजनबी सा ये शहर
आज खासा हमदर्द सा लगा
जब से जाना
अजनबियत है
कायदा और अदब इसका

आज गुजरते हुए फुटपाथ से
देखा चार पैबंद लगी चादरों
को खींच कर बनाया प्रसव् गृह
और भीतर जन्म लेता
एक नया जीव

सामने पार्क के ब्याई काली कुतिया
याद आ गयी
सदः प्रसवा शिशु पिल्लै गडमगड
हो गए मेरी आँखों के सामने

मैंने चढ़ाया आँखों पर
अजनबियत का चश्मा
आखिर ये कायदा और अदब है मेरे
मेरे शहर का
और देखो !
अब ये शहर अजनबी नहीं रहा
मृदुला शुक्ला

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