Monday, 22 April 2013

मेरी कविता...

मैंने कब कहा की मैंने जो लिखा
उसे सजा दो तुम मंदिरों मैं
मान कर तुलसी का मानस
ये भी तो नहीं कहा की
मानो मुझे अपाला घोषा या गार्गी

इमान से सोच कर बोलो की मैंने कहा कभी ये
की मैं गढ़ रही हूँ कोई शास्त्र या पुराण
भयभीत मत हो
भय और असुरक्षा आक्रामक बना देती है हमें
बेवजह

माना की तुम स्वम्भू पञ्च हो
अनादि परमेश्वर
हमें साध नहीं है
पञ्च होने की
कूको न तुम पंचम स्वर में
हमें गाने दो हमारा आदिम अनगढ़ गान

( झींगुरों और टिटिहरियों के आवाज के बिना भी अपूर्ण होता है जंगल )
मृदुला शुक्ला

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