Sunday, 12 May 2013

एक वचन...



जब तुम मुझसे कर रहे थे प्रणय निवेदन
तुम्हारी गर्म हथेलियों की बीच
कंपकंपा रहा था मेरा दायाँ हाथ
ठीक उसी वक्त
तुम्हारे कमरे की दीवार पर मेरे ठीक सामने
टगी थी एक तस्वीर
जिसमे एक जवान औरत पीस रही थी चक्की
और बूढी औरत दे रही थी चक्की के बीच दाने
पास ही औंधा पड़ा खाली मटका
उन्हें उनकी अगली लड़ाई की याद दिला रहा
उसी तस्वीर में एक जवान आदमी दीवार से सिर टिका
गुडगुडा रहा था हुक्का
और एक बुड्ढा वहीँ बैठा बजा रहा था सारंगी

मुझे स्वीकार है तुम्हारा प्रणय निवेदन
बिना सात फेरों के बिना सातों तो वचन के !!
बस एक वचन की
जब मेरा बेटा कर रहा हो प्रणय निवेदन अपनी सहचरी से
तो उसके पीछे दीवार पर टंगी तस्वीर में
बूढी औरत बजा रही हो सारंगी
बुढ़ा गुडगुडा रहा हो हुक्का
और जवान औरत और आदमी
मिल कर चला रहे हो चक्की
सुनो !क्या तुम मेरे लिए
बदल सकते हो दीवार पर टंगी इस तस्वीर के पात्रो  की जगह भर ?




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