Sunday, 9 June 2013

इच्छाएं

इच्छाओं की मृत्यु पर होता ही मिथ्या रुदन
उनके दत्तक पुत्र नहीं आते आगे
अंतिंम संस्कार को
हरे कल्लेदार बांस नहीं कटते
बंधती नहीं तिखितियां
निर्वाह नहीं होता मुखाग्नि की परम्परा का
तिरोहित नहीं किया जाता तर्पयामि की ध्वनी से
कुशाग्र पर रख काले तिल
शोक समाप्ति के दिन नहीं घुटवाते
इच्छाओं की तरह उग आये बाल

नहीं सुना जाता गरुड़ पुराण आत्मा की मुक्ति हेतु

इच्छाएं न तो मुक्त होती हैं स्वम्, और न करती है हमें
हमारे कंधे ढोते रहते हैं
उनकी बजबजाती लाश आस पास मंडराता रहता है उनका प्रेत
                                                                                                       -मृदुला शुक्ला

देवता

मैं देखती हूँ स्वप्न
एक दिन धरती पर जब पाप होगा अपने चरम पर
(चरम की परिभाषा निर्धारित नहीं है )
सभी पत्थरों से देवता कर जायंगे कूच
और निकल आयेंगे बाहर
चूँकि देवता इंसानों के डर से अपने मंदिर
मैं नहीं रहते निहथ्थे
इसलिए जब वे आयेंगे बाहर
तो होंगे हथियारों से लैस

वे टिक न पायंगे मिसाइलों के सामने
भाले धनुष और तलवार लेकर
हार जायंगे हर लड़ाई
इंसान अपने गढ़े देवताओं को देखेगा हारते
कोसेगा अपने पूर्वजों को
फिर गढ़ेगा
नया इश्वर
नए देवता
उनके हाथों में होंगे आधुनिक हथियार
काश की इस बार वो अपने देवता गढ़े
हाड़ मांस के
न कि पत्थरों से
                                                    मृदुला शुक्ला

न्याय

आज तक सोचती रही हूँ सिर्फ अपने लिए
उस औरत के लिए ,
जो पिटती रहती है मेरे पड़ोस में
और मैं मुट्ठियाँ भींचे चुप रहती हूँ
किसी के निजता की रक्षा के लिए
जबकि मैं ये अच्छी तरह जानती हूँ की उसकी पीठ के नीले निशान पड़ते है पूरी औरत जात पर

मैं तब भी चुप रहती हूँ आँखों मैं आंसू लिए
जब वो जला दी जाती है
एसिड से या फिर दहेज़ की आग में
मैं पट्टी बाँध लेती हूँ आँखों पर गांधारी के तरह, जब हम सडको पर घुमाई जाती हैं निर्वस्त्र
मैं तब भी चुप रहती हूँ
जब !
जब !
जब !
मगर क्या आज भी चुप रहूँ जब
उसे तो औरत
बनने से पहले ही मिल गयी पूरी औरत जात की सजा

जब तुम सर झुका कर कहते हो
मैं शर्मिंदा हूँ
तब मैं तुम्हारे लिए कुछ करना चाहती हूँ !

आज तक मेरे लिए तो किया नहीं कुछ
अब खुद के लिए तो करो
या फिर दे दो न्याय दंड मेरे हाथों में
मृदुला शुक्ला

चाँद

बचपन में जब जिद पर अड़े
छूने को चाँद
माँ ने उतार दिया
पूरनमासी का चाँद थाली भर पानी में

चाँद भी न, आता है
चप्पू चलाता खुबसुरत रंगों की पाल डाले
पानियों के रास्त जमीन पर उतरने की
आदत सी है उसे

चाँद को याद रहता है धरती और आकाश के बीच
फैले निर्वात के बारे में
और विज्ञान की कक्षा में पढ़ा ये नियम
निर्वात मैं चलने के लिए
ध्वनि को भी आवश्यकता होती है माध्यम की

जब भूले से कभी प्रेयसिया
मांग कर बैठती हैं चादं की
अपने प्रेयस से किसी कमज़ोर पल मे
वो भी दे जातें हैं ढेर सारा पानी
उनकी आँखों में

आखिर चाँद को पानी के सहारे ही तो उतरना होता ज़मीन पर
                                                                                              -मृदुला शुक्ला

ख़ास आदमी

अगर तुम हो आम आदमी
इस बार प्रार्थना में
ईश्वर से माँगना
गूंगी बहरी और अंधी हो जाए तुम्हारी आत्मा
ताकि तुम भी बन सको ख़ास

अगर आत्मा की होती है आवाज
तो उसे सुनने के लिए जरुर होते होंगे आत्मा के कान
फिर तो आँखे भी होती होंगी कहीं न कहीं

मगर खास लोग तो शायद
मांगते नहीं छीन लेते हैं

फिर बंद करो दैन्य प्रार्थनाएं
सारे आम लोंगो
मिलकर धावा बोल दो
ईश्वर को कर दो मजबूर
कहो की वो वापस ले
हमारी आत्मा के आँख कान और जुबान

देखो न !!

कितना आसान है आम से ख़ास हो जाना
                                                                              -मृदुला शुक्ला

बंद कमरा

बहुत बेतरतीब है कामगारों की बस्ती सा ये कमरा ,
बंद पड़ी दीवाल घडी वक्त पूछती रहती है सबसे
वक्त बे वक्त
और हमेशा अपना सीना टटोल मिस करती रहती है
टिक टिक की आवाज

चिंता में रहती है तीन टांगो वाली डायनिंग टेबल
इस घर के लोग अब कुछ खाते क्यूँ नहीं
याद करती है पकवानों की खुशबु
और खो जाती है बिना रुके चलती पार्टियों के दौर में

गठ्ठर मैं बंधी किताबें हुलस कर बात करती हैं अक्सर
उन दिनों की जब वो चिपकी रहा करती थी किसी नाजनीन के सीने से

इस कमरे में अक्सर कानाफूसी होती है
यंहा टेबल तीन पैर की तिपाया दो पैर का
कुर्सियां बिना हत्थे की क्यूँ हैं

जब भी चरमरा कर खुलता है दरवाजा
चौकन्नी हो जाती है जंग खाई सिलाई मशीन
शायद आज फिर कोई तेल डाल करेगा पुर्जे साफ़, ,
वो इतराती हुई सी गढ़ेगी कुछ नया सा

हैंडल टूटे मग अक्सर बाते करते हैं कॉफ़ी के
अलग अलग फ्लेवर के बारे में,

कभी कभी मुझे ये कमरा बस्ती से दूर किसी वृधाश्रम सा लगता है
जहाँ सब खोये होते हैं अपनी जवानी के दिनों में,
सब रहते हैं उदास,
धूल की एक मोटी चादर बड़े प्यार से
समेट कर रखती उन सबको अपने भीतर,
जैसे अवसाद समेटे रहता है बुजर्गों को

मकड़िया मुस्कुराती रहती हैं सुन कर इनकी बातें
बुनते हुए जाल इस छोर से उस छोर तक
मानो सेवक हो वृधाश्रम के

                                                              -मृदुला शुक्ला

उम्मीदें-सपने...

एक जहाँ हो हमारा भी
जहाँ तल्खियां मुस्कुरा कर गले मिले
रुसवाइयों को मिल जाए पंख शोहरतों के
जब तोली जाए खुशियाँ बेहिसाब
तो दूसरे पलड़े पर रखा जाए थोड़ा सा गम

सुबहें थोड़ी धुंधली सही
शामे पुर रौशन हों
बूढी इमारतों के पास हो अपनी खुद की आवाज
जो भटके मुसाफिरों को रास्ते पर लायें
सुना कर कहानी अपनी बुलंदगी के दिनों की

जहाँ हमारी हाँ को हाँ
और ना को ना सुना जाए
वही समझा भी जाए

शायद मैं नींद में हूँ

मगर क्या करूँ मेरी उम्मीदों के पाँव भारी हैं
मेरे सपने पेट से हैं
                                                                                         -मृदुला शुक्ला

Friday, 24 May 2013

तीली...


त्रासद है
बनना दिया
मगर सार्थक हो जाता है जलना
जब तेज हवाओं में हिलती लौ
सहेज ली जाती है
दो मेहंदी लगी हथेलियों से

बनना दिया पूजा की थाल का
हर हाथ गुजर जाता है
उसके ऊपर याचक की मुद्रा में
निगाहें नीची किये
मांगते हुए कभी क्षमा कभी कुछ और

तुलसी के चौरे का ,
माथे पर आँचल किये
पनीली आँखे समेटती हैं उजास
अपनों के लिए
और हर जगह पास पड़ी
तीली सुलग रही होती है
धुंवा धुंवा
सौंप कर दिए को
अपना प्रकाशवाही साम्राज्य
मृदुला शुक्ला

मकान

सिमटती ज़मीन ने गढ़े घरों के नए नाम
घर सिमटे फ्लैट में
और जिंदगियां बेडरूम हो गयी

जो कभी हुआ करते थे
राजे महराजों के
अलग अलग मौसम और
रानियों के मिजाज़ के हिसाब से

घुरुहू मंगरू तो सो रहते थे
ओसारे में चारपाई डाल
थकान से पस्त
औरत मर्द अगल बगल
नीम अन्धेरा सन्नाटा तोडती
झींगुरो और सियारों
की स्वर लहरिया
एक दुसरे के साथ संगत करती सी

रौशनी से जगमगाते शहर में
नींद की गोलियां खा
अभिनयरत हैं सभी नींद के
चिंहुक चिहुंक

मानो महाराजा हैं किसी मुल्क के
हमला हो सकता है किसी भी वक्त
मृदुला शुक्ला

प्यास का इतिहास...



प्यास का इतिहास लिखे जाने की
मुनादी हुई नक्कार खानों से
(जहाँ कभी नहीं सुनी गयी आवाज तूती की )

बुलाये गए समंदर सारे
झीलें भी न्योती गयीं
नदियां भी आई ,पूरी सजधज से
कुओं ने भी जुगत लगाईं
और शामिल हो गए
सदस्य् मंडल में

तैयार हुआ इतिहास
चटपटी मसालेदार कहानी सा .............

काश! उनमे शामिल होता
आधा भरा घड़ा, या फिर
पूरी भरी सुराही
शायद इतिहास मसालेदार कहानी नहीं
सचमुच होता, प्यास का का इतिहास
                                                                  -मृदुला शुक्ला

Sunday, 12 May 2013

एक वचन...



जब तुम मुझसे कर रहे थे प्रणय निवेदन
तुम्हारी गर्म हथेलियों की बीच
कंपकंपा रहा था मेरा दायाँ हाथ
ठीक उसी वक्त
तुम्हारे कमरे की दीवार पर मेरे ठीक सामने
टगी थी एक तस्वीर
जिसमे एक जवान औरत पीस रही थी चक्की
और बूढी औरत दे रही थी चक्की के बीच दाने
पास ही औंधा पड़ा खाली मटका
उन्हें उनकी अगली लड़ाई की याद दिला रहा
उसी तस्वीर में एक जवान आदमी दीवार से सिर टिका
गुडगुडा रहा था हुक्का
और एक बुड्ढा वहीँ बैठा बजा रहा था सारंगी

मुझे स्वीकार है तुम्हारा प्रणय निवेदन
बिना सात फेरों के बिना सातों तो वचन के !!
बस एक वचन की
जब मेरा बेटा कर रहा हो प्रणय निवेदन अपनी सहचरी से
तो उसके पीछे दीवार पर टंगी तस्वीर में
बूढी औरत बजा रही हो सारंगी
बुढ़ा गुडगुडा रहा हो हुक्का
और जवान औरत और आदमी
मिल कर चला रहे हो चक्की
सुनो !क्या तुम मेरे लिए
बदल सकते हो दीवार पर टंगी इस तस्वीर के पात्रो  की जगह भर ?




Monday, 22 April 2013

अजनबियत...

कल अजनबी सा ये शहर
आज खासा हमदर्द सा लगा
जब से जाना
अजनबियत है
कायदा और अदब इसका

आज गुजरते हुए फुटपाथ से
देखा चार पैबंद लगी चादरों
को खींच कर बनाया प्रसव् गृह
और भीतर जन्म लेता
एक नया जीव

सामने पार्क के ब्याई काली कुतिया
याद आ गयी
सदः प्रसवा शिशु पिल्लै गडमगड
हो गए मेरी आँखों के सामने

मैंने चढ़ाया आँखों पर
अजनबियत का चश्मा
आखिर ये कायदा और अदब है मेरे
मेरे शहर का
और देखो !
अब ये शहर अजनबी नहीं रहा
मृदुला शुक्ला

उदासी

बहुत ख़याल रखती है ये उदासी मेरा
दिन भर आस पास रहती है
जिसे छोड़ गए थे
मेरे दायरों में तुम ,
और शायद बोल भी गए होगे
ख़याल रखने को

दिन भर ओढ़ कर रखती हूँ इसे
शाम को आधा बिछा लेती हूँ
और जो बचती है
इसे आँखों से गिरा
चादरों और तकियों
पे सजा लेती हूँ

ये सितारों जो सजे होते हैं तकियों पे मेरे
रात भर जुगनू सा टिमटिमाते हैं

डरती हूँ कहीं लौट करआ जाओ न तुम
मेरी शामों मेरे तकियों
पे सजे तारे समेट लेने को
लगा के मुझे फिर से
गुलाबी रौशनी का नशा
चुपचाप बिन कहे
फिर से चले जाने को
मृदुला शुक्ला

मेरी कविता...

मैंने कब कहा की मैंने जो लिखा
उसे सजा दो तुम मंदिरों मैं
मान कर तुलसी का मानस
ये भी तो नहीं कहा की
मानो मुझे अपाला घोषा या गार्गी

इमान से सोच कर बोलो की मैंने कहा कभी ये
की मैं गढ़ रही हूँ कोई शास्त्र या पुराण
भयभीत मत हो
भय और असुरक्षा आक्रामक बना देती है हमें
बेवजह

माना की तुम स्वम्भू पञ्च हो
अनादि परमेश्वर
हमें साध नहीं है
पञ्च होने की
कूको न तुम पंचम स्वर में
हमें गाने दो हमारा आदिम अनगढ़ गान

( झींगुरों और टिटिहरियों के आवाज के बिना भी अपूर्ण होता है जंगल )
मृदुला शुक्ला

खुद से प्रेम...

जब बात चलती है प्रेम की तो आँखों में
तैर जाता है तुम्हारा चेहरा अनायास
फिर हिंडोले सा झूलता है हुआ
तुम्हार संसार
सहेजती हूँ!!
पिछली शाम
खरीद कर लाया टी सेट ,
माँकी दी हुई साडी ,
सासु माँ के कंगन,
वो तुलसी जो बालकनी को आँगन बनती है

संभाल कर जलाती हूँ रोज मंदिर का दिया
अंदर कुछ टूट जाता है जब
बर्तन मांजते हुए महरी से टूट जाता है
पुराने कप का हैण्डल

बेचैन रहती हूँ दिन भर
जब तुम भूल जाते हो अपना टिफिन
हड़बड़ी में
जबकि जानती हूँ की कंटीन है
तुम्हारे केबिन के बगल में

जीती हूँ तुम्हारे रिश्ते नाते
अपनों की तरह
तुम्हारी दुनिया की परिधि में खींच लेती हूँ एक नयी वृत्त
तुम्हे केंद्र मान कर
सब से प्रेम करती हूँ
सिवाय खुद के
कल एक ख्याल आया की
चलो खुद से भी प्रेम किया जाए

धत्त !!औरतों से भी कोई कोई प्रेम करता है
उनसे तो इश्क किया जाता है
मृदुला शुक्ला

चाँद और रोटी

पिछली पूरनमासी पर जब तुम्हारा पोर पोर
डूबा हुआ था चाँद से टपकते शहद मैं
तो मैं अपनी कविता में बो रही थी रोटियाँ
खेतों मैं गेंहू बोने सा
बालियों में रस पड़ने सा
या खेतों में पक कर सुनहरी धूप के फैलने सा

क्यूंकि चादं से टपकता शहद एक चीख बन कर मेरे
कानो में घुला था
भूखों !यूँ मत देखो मुझे मैं रोटी नहीं हूँ

जबकि मैं जानती हूँ की कवितायें नहीं भरती पेट
कविता लिखने वालों का भी

जब तुम गा रहे थे झील बादल ओस !
तो मैं भटक रही होती हूँ तीजन के साथ
सर पर पानी का मटका लिए
पत्थरों के जंगल मैं
तुम्हारे ख्यालों की झील से से १० कोस दूर

क्यूंकि मैं ये भी जानती हूँ की ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती

तुम चलो ना !
रास्ते के दायीं तरफ और
मैं चलती हूँ बायीं तरफ
फिर भी हम होंगे साथ साथ
सामानांतर और
शायद अलग अलग भी 
                                                       -मृदुला शुक्ला 

खबर

सुबह तो लपक कर पकड़ते हो तुम हमें
और फिर सबसे पहले मिलती
भी उसे हूँ जो
पावरफुल हो घर में
रिटायर्ड बुजूर्ग ताकते हैं अपनी बारी को
इस उलाहने के साथ
की कौन सा तुम्हे ऑफिस जाना है

कई बार मुझे होठों मैं बुदबुदा कर पढ़ा जाता है
तो कई बार चटखारे लेकर जोर जोरसे
पड़ोसियों को भी कभी कभी सुनना पड़ता है अनचाहे
मुझे अगर मुझे में ताने जैसा मसाला हुआ तो

जितनी मसालेदार हुई
पढ़ी भी जाती हूँ उतने उच्च स्वर मैं

अरे अखबार की
खबर हूँ मैं !
मगर शाम होते ही हो जाती हूँ बासी
फिर एक दिन बेच दी जाती हूँ
कबाड़ी के हाथ कबाड़ के भाव
और रीसाइक्लिंग मैं बिखर जाता है रेशा रेशा मेरा

और आज फिर देखो मैं आ गयी पुनर्जन्म लेकर
अरे हम ख़बरें भी मरती हैं क्या भला
हम तो बस बदल लेती हैं अखबार
मृदुला शुक्ला

कविता...

मैं नहीं लिखना चाहती कविता
न गढ़ना चाहती हूँ
ये न तो रास है न रंग
न ही मेरा प्रेमपत्र
ये बाकायदा प्रसवित की जाती मेरे द्वारा
एक सम्पूर्ण प्रसव वेदना के उपरांत

विसंगतियां बीज डाल देती हैं मुझमे
मेरी संवेदना की नाल से जुड़ वो
सोखने लगती ही प्राण रस
अवधि पूरी होने पर अवशम्भावी है
प्रसव का हो जाना

"मेरी संवेदना और विसंगतियों की वैध संतान है मेरी कविता "
                                                                                                                          -मृदुला शुक्ला

Thursday, 4 April 2013

सन्नाटे बोकर गीत उगती हूँ...

सन्नाटे बोकर गीत उगाती हूँ
देखो मै तूफानों में भी दीप जलाती हूँ ,

बिजुरी को बाँधा है मैंने आँचल से
मैं मेह खींच कर लाती हूँ काले जिद्दी बादल से,

सूरज भी मेरी खातिर छुप छुप कर छांह करे है
अग्निमुखी गीतों से मै अलख जगाती हूँ,

सन्नाटे बोकर गीत उगाती हूँ!

बंजर मे भी बीजों के बिन आशा के पौध लगाती हूँ
शमशानों मे भी जाकर जीवन ही दोहराती हूँ,

घिर कर के घोर विप्पति मे भी अपना धर्म निभाती हूँ
मैं नीलकंठ विषपायी बनकर जहर पचाती हूँ|
सन्नाटे बोकर गीत उगाती हूँ !

                                                                                                    -मृदुला शुक्ला

महिला दिवस

 आइये मनाएं महिला दिवस
की शायद कल हट सकें
अस्पतालों के बाहर लगी तख्तियां
जिन पर लिखा होता है
की "यहाँ लिंग परिक्षण नहीं किया जाता"
(की जो इशारा मात्र होता है
 यह बताने का यहाँ ये संभव है)

की शायद बंद हो सके
दी जाने वाली बधाईयां
पुत्र जन्म पर
गाये जाने वाले सोहर
बजाई जाने वाली थाली
हिजड़ों के नाच
और बेटी के जन्म पर
"कोई नहीं जी आजकल तो
बेटे और बेटी बराबर हैं"


की शायद फिर न
नोच कर फेक दी जाए
गटर के पास कोई कन्या
जो पिछले नवरात्रों में
पूजी गयी थी
देवी के नाम पर

की शायद बंद हो सके चकले
जहाँ हर दिन औरत
तौलकर खरीदी जाती है
बकरे और मुर्गे
के गोश्त के भाव

की शायद जीवन साथी चुनते समय
देखि जाए सिर्फ और सिर्फ लड़की
न तौली जाए रूपए या रसूख के पलड़े पर
और फिर न ढ पड़े किसी बाप को अपनी
जिन्दा जलादी गयी बेटी की लाश

की शायद खाली पेट
और दोहरी हुई पीठ
पर बच्चा बांधे
सर पर सीमेंट का टोकरा लिए
बिल्डिंग की इमारत पर चढ़ती औरत
न तौली  जाए
ठेकेदार की नज़रों से
रात के
स्वाद परिवर्तन के लिए

की शायद फिर न
कोई प्यारी खूबसूरत शक्ल
जला दी जाए एसिड से
अस्वीकार करने पर
अवांछित प्रणय निवेदन

की हम औरते भी मानी जाए
देह से परे भी कुछ
बलत्कृत न हों
हर बार
घर से बाहर निकलने पर
भीतर तक भेदती निगाहों से
और उन गालियों से
जो हमारे पुरुषों को दी जाती हैं
हमारे नाम पर

की शायद.........
की शायद......

की हम भी
स्वीकार कर लिए जाएं
सामान्य इंसान की तरह
आइये मनाये महिका दिवस
इस उम्मीद के साथ
की अगले वर्ष कुछ तो
बदला रहेगा हमारे लिए

                                                                        -मृदुला शुक्ला