Sunday, 9 June 2013

ख़ास आदमी

अगर तुम हो आम आदमी
इस बार प्रार्थना में
ईश्वर से माँगना
गूंगी बहरी और अंधी हो जाए तुम्हारी आत्मा
ताकि तुम भी बन सको ख़ास

अगर आत्मा की होती है आवाज
तो उसे सुनने के लिए जरुर होते होंगे आत्मा के कान
फिर तो आँखे भी होती होंगी कहीं न कहीं

मगर खास लोग तो शायद
मांगते नहीं छीन लेते हैं

फिर बंद करो दैन्य प्रार्थनाएं
सारे आम लोंगो
मिलकर धावा बोल दो
ईश्वर को कर दो मजबूर
कहो की वो वापस ले
हमारी आत्मा के आँख कान और जुबान

देखो न !!

कितना आसान है आम से ख़ास हो जाना
                                                                              -मृदुला शुक्ला

बंद कमरा

बहुत बेतरतीब है कामगारों की बस्ती सा ये कमरा ,
बंद पड़ी दीवाल घडी वक्त पूछती रहती है सबसे
वक्त बे वक्त
और हमेशा अपना सीना टटोल मिस करती रहती है
टिक टिक की आवाज

चिंता में रहती है तीन टांगो वाली डायनिंग टेबल
इस घर के लोग अब कुछ खाते क्यूँ नहीं
याद करती है पकवानों की खुशबु
और खो जाती है बिना रुके चलती पार्टियों के दौर में

गठ्ठर मैं बंधी किताबें हुलस कर बात करती हैं अक्सर
उन दिनों की जब वो चिपकी रहा करती थी किसी नाजनीन के सीने से

इस कमरे में अक्सर कानाफूसी होती है
यंहा टेबल तीन पैर की तिपाया दो पैर का
कुर्सियां बिना हत्थे की क्यूँ हैं

जब भी चरमरा कर खुलता है दरवाजा
चौकन्नी हो जाती है जंग खाई सिलाई मशीन
शायद आज फिर कोई तेल डाल करेगा पुर्जे साफ़, ,
वो इतराती हुई सी गढ़ेगी कुछ नया सा

हैंडल टूटे मग अक्सर बाते करते हैं कॉफ़ी के
अलग अलग फ्लेवर के बारे में,

कभी कभी मुझे ये कमरा बस्ती से दूर किसी वृधाश्रम सा लगता है
जहाँ सब खोये होते हैं अपनी जवानी के दिनों में,
सब रहते हैं उदास,
धूल की एक मोटी चादर बड़े प्यार से
समेट कर रखती उन सबको अपने भीतर,
जैसे अवसाद समेटे रहता है बुजर्गों को

मकड़िया मुस्कुराती रहती हैं सुन कर इनकी बातें
बुनते हुए जाल इस छोर से उस छोर तक
मानो सेवक हो वृधाश्रम के

                                                              -मृदुला शुक्ला

उम्मीदें-सपने...

एक जहाँ हो हमारा भी
जहाँ तल्खियां मुस्कुरा कर गले मिले
रुसवाइयों को मिल जाए पंख शोहरतों के
जब तोली जाए खुशियाँ बेहिसाब
तो दूसरे पलड़े पर रखा जाए थोड़ा सा गम

सुबहें थोड़ी धुंधली सही
शामे पुर रौशन हों
बूढी इमारतों के पास हो अपनी खुद की आवाज
जो भटके मुसाफिरों को रास्ते पर लायें
सुना कर कहानी अपनी बुलंदगी के दिनों की

जहाँ हमारी हाँ को हाँ
और ना को ना सुना जाए
वही समझा भी जाए

शायद मैं नींद में हूँ

मगर क्या करूँ मेरी उम्मीदों के पाँव भारी हैं
मेरे सपने पेट से हैं
                                                                                         -मृदुला शुक्ला

Friday, 24 May 2013

तीली...


त्रासद है
बनना दिया
मगर सार्थक हो जाता है जलना
जब तेज हवाओं में हिलती लौ
सहेज ली जाती है
दो मेहंदी लगी हथेलियों से

बनना दिया पूजा की थाल का
हर हाथ गुजर जाता है
उसके ऊपर याचक की मुद्रा में
निगाहें नीची किये
मांगते हुए कभी क्षमा कभी कुछ और

तुलसी के चौरे का ,
माथे पर आँचल किये
पनीली आँखे समेटती हैं उजास
अपनों के लिए
और हर जगह पास पड़ी
तीली सुलग रही होती है
धुंवा धुंवा
सौंप कर दिए को
अपना प्रकाशवाही साम्राज्य
मृदुला शुक्ला

मकान

सिमटती ज़मीन ने गढ़े घरों के नए नाम
घर सिमटे फ्लैट में
और जिंदगियां बेडरूम हो गयी

जो कभी हुआ करते थे
राजे महराजों के
अलग अलग मौसम और
रानियों के मिजाज़ के हिसाब से

घुरुहू मंगरू तो सो रहते थे
ओसारे में चारपाई डाल
थकान से पस्त
औरत मर्द अगल बगल
नीम अन्धेरा सन्नाटा तोडती
झींगुरो और सियारों
की स्वर लहरिया
एक दुसरे के साथ संगत करती सी

रौशनी से जगमगाते शहर में
नींद की गोलियां खा
अभिनयरत हैं सभी नींद के
चिंहुक चिहुंक

मानो महाराजा हैं किसी मुल्क के
हमला हो सकता है किसी भी वक्त
मृदुला शुक्ला

प्यास का इतिहास...



प्यास का इतिहास लिखे जाने की
मुनादी हुई नक्कार खानों से
(जहाँ कभी नहीं सुनी गयी आवाज तूती की )

बुलाये गए समंदर सारे
झीलें भी न्योती गयीं
नदियां भी आई ,पूरी सजधज से
कुओं ने भी जुगत लगाईं
और शामिल हो गए
सदस्य् मंडल में

तैयार हुआ इतिहास
चटपटी मसालेदार कहानी सा .............

काश! उनमे शामिल होता
आधा भरा घड़ा, या फिर
पूरी भरी सुराही
शायद इतिहास मसालेदार कहानी नहीं
सचमुच होता, प्यास का का इतिहास
                                                                  -मृदुला शुक्ला

Sunday, 12 May 2013

एक वचन...



जब तुम मुझसे कर रहे थे प्रणय निवेदन
तुम्हारी गर्म हथेलियों की बीच
कंपकंपा रहा था मेरा दायाँ हाथ
ठीक उसी वक्त
तुम्हारे कमरे की दीवार पर मेरे ठीक सामने
टगी थी एक तस्वीर
जिसमे एक जवान औरत पीस रही थी चक्की
और बूढी औरत दे रही थी चक्की के बीच दाने
पास ही औंधा पड़ा खाली मटका
उन्हें उनकी अगली लड़ाई की याद दिला रहा
उसी तस्वीर में एक जवान आदमी दीवार से सिर टिका
गुडगुडा रहा था हुक्का
और एक बुड्ढा वहीँ बैठा बजा रहा था सारंगी

मुझे स्वीकार है तुम्हारा प्रणय निवेदन
बिना सात फेरों के बिना सातों तो वचन के !!
बस एक वचन की
जब मेरा बेटा कर रहा हो प्रणय निवेदन अपनी सहचरी से
तो उसके पीछे दीवार पर टंगी तस्वीर में
बूढी औरत बजा रही हो सारंगी
बुढ़ा गुडगुडा रहा हो हुक्का
और जवान औरत और आदमी
मिल कर चला रहे हो चक्की
सुनो !क्या तुम मेरे लिए
बदल सकते हो दीवार पर टंगी इस तस्वीर के पात्रो  की जगह भर ?