Wednesday, 27 March 2013

विस्फोट

धमाको से नहीं उड़ते
चीथड़े सिर्फ इंसानी जिस्मो के
बल्कि उड़ जाते हैं
परखच्चे
अमन और ईमान के

फिजा में रह जाती है बारूद की महक
बरसों बरस
इंसानी दिमाग मैं बैठे
नफरत के फितूर सी

अब फिर कुछ दिनों
तक इंसानियत
भीख मांगेगी
चौराहों पर
नुक्कड़ की पगली सी ......
(हम शर्मिंदा हैं )
                                                                             -

मृदुला शुक्ला

Tuesday, 26 March 2013

दूत

काली दास ने मेघो को चुना था
और मैंने तुम्हे
सन्देश देने के लिए ,

सुनो जब आज शुरू करोगे
तुम खुद से मुझ तक लौटने का सफ़र
तो रस्ते मैं आये सातों
समन्दरों से कहना !!!
इस प्रवास मैं कम हो गयी
तुम्हारी गहराई
उथले लगने लगे तुम
जब से नापी है
गहराई किसी परिपूर्ण
हृदय की !

और कहना
पहाड़ों से
तुम हरे से पीले हो जाते
बादलों के एक बरस के इंतज़ार मैं
और कोई  जन्म जन्मान्तर
तक तक प्रतीक्षा का
 विशवास लिए बैठा है

कहना नदियों से की
वो जारी रखें समुन्दर तक जाने का
सफ़र चिरकाल तक,
जब तक मीठा
न हो जाए समुंदर

आकाश यात्रा मैं जब
मिलेंगी व्योम बालाएं
तो बताना उन्हें
फीके से लगते हैं
तुम्हारे नकली चहरे
जब याद आता है किसी
प्रेममयी आँखों का माधुर्य
अब तक भी तो दूत ही थे न
आज मेरे बनोगे

                                                          -मृदुला शुक्ला

फागुन

सुना है इस शहर मैं हर साल
इसी मौसम में एक जोगी आता है
 इस शहर के लोग उसे फागुन सा कुछ कहते हैं

फागुन के आते ही इस शहर को कुछ हो जाता है
गाड़ियों से निकलते हैं गुलाबी धुवें
मोटरों की हॉर्न फाग गाती सी लगती है

वो धुप जो कुछ दिन पहले बालकनियों में
मरियल कुत्ते सी कूँ कूँ करती थी
आसमान की कनपटी पर गुलाबी होकर बिखर जाती है
आँखे तो देखो इसकी कैसी सुर्ख हो रक्खी है
अरे !
समझाओ इसे कोई फागुन को गुलाबी रंग ही फबता है
और देखो इन दरख्तों को अभी अभी तो उतारें हैं धूसर कपडे
और अब देखो हरे रंग मैं इतराते से हैं

मैं हर रोज ढूंढती हूँ फागुन को, मिल जाए कहीं
तो कस कर पकड़ लूं कलाई उसकी
वो दिखता नहीं गुम है इस शहर के हुजूम में कहीं

मैं चाहती  हूँ की वो ठहर जाए इस शहर में  कहीं
वर्ना जब वो जाता है  तो ले  जाता है
सारे रंग और कहकहे सब के होंठो से
और छोड़ जाता है सलेटी धुंवे मैं डूबा आसमान
सिले हुए होंठो के लोंगो से अटे रस्ते

और फिर शहर अकेला इंतज़ार करता है अगले  साल फागुन का
                                                                                                                -मृदुला शुक्ला

नैन

नैन कहते रहे, नैन सुनते रहे,
नैन ही नैन मे मुस्कुराते रहे|


वेदना की सभी मधुर अभिव्यक्तिया,
नैन ही नैन मे गुनगुनाते रहे|

गीत भी नैन हैं नैन ही साज हैं,
सात स्वर नैन है नैन झंकार हैं|

नैन श्रृंगार हैं नैन संहार हैं,
दंड भी नैन हैं नैन उपहार हैं |

नैन ही नैन मैं रूठ जाते हैं वो,
नैन ही नैन मे हम मनाते रहे|

नैन चटक लगे नैन सीपी लगे,
स्वाति की बूँद से इनमे मोती जगे|

नैन कान्हा लगे नैन राधा लगे,
नैन सम्पूर्णता नैन आधा लगे|

मन की अनुभूतियाँ धडकनों मे जगे,
नैन ही नैन विस्तार पाते रहे |

                                                                    -मृदुला शुक्ला

रतजगे

दिन के उजाले सोते
तू रतजगों में शामिल
महफ़िल रहे अकेली
वीरानियों में महफ़िल

तू साथ है
तो हर शय गाती और मुस्कुराती
जो तू नहीं
तो मुझको कुछ भी नहीं है हासिल

तुमसे भली तो मुझको
लगती तुम्हारी यादें
तू साथ दे या न दे
वो हो न मुझसे  गाफिल 

                                                       -मृदुला शुक्ला

बिछुए

दिन भर थकी आंते
बुझी आँखे
चमकाती रही मालिक
के किलो-किलो भर चांदी के बर्तन

और शाम
रुपहले रंग की सुनहली
चमक आँखों से निकल कानो तक फ़ैल गई
जब मेले मैं हरिया ने
दिलाये उसे चांदी से दिखने वाले बिछुए

दिन भर की थकान
हंस हंस कर बिखरती रही
मेले से घर लौटते
हरिया के काँधे पर
                                                           -मृदुला शुक्ला

रिश्ते

काश!!
रिश्ते सिले जाते
सुई धागे से

आखिरी छोर पर
एक मज़बूत गाँठ
लगा कर

काते जाते
चरखों पर

या फिर लपेट
कर रख लिए जाते
गर्म ऊन के गोलों की तरह
फंदा दर फंदा उतरते
सलाइओं पर

या कि फिर बनते
शहर के बाहर
कताई मिलों में
जिनकी चिमनिया
दूर से
क़ुतुब मीनार में
आग लगने का
भ्रम पैदा करती हैं

जिनके पिछ्वाड़ो
पर रहते रिश्ते बुनने वाले
दिहाड़ी मजदूर
आधे नंगे

तो क्या बदल जाता?
तब भी,
ठन्डे और गर्म
होते रिश्ते
बाजारों में बिकते रिश्ते
ऊँचे दामों पर
तो कभी ठेलों पर
नीलाम होते रिश्ते
कभी सस्ते
तो कभी महंगे होते,
ऊंची दुकानों में
फीके पकवानों से सजते रिश्ते

लेकिन..............
तब भी,
तुम जीते
रेशमी, गुलाबी
धागों से बुना
महकता खूबसूरत
महीन, जहीन मेरा रिश्ता

और मै............
बेतरतीब,अधउघडा
मोटे धागों से बुना,
जिसके पैबन्दो से
भी मै ढांप न पाती,
अपनी मोहब्बत
और तुम्हारी....................

मृदुला शुक्ला