Tuesday, 2 April 2013

छोटे शहर

बस और ट्रेन मैं बैठ कर अक्सर
मेरा उस शहर से गुजरना होता है
जिसे छोटा शहर कहा जाता है
हर बार हचह्चाती हुई बस गुजरती है
उन्ही खडंजे वाली सड़कों से
जहाँ मेरी उम्र के बराबर की गुमटियों तब से खड़ी हैं
वैसे ही चार बिस्कुट डाले मर्तबानो मैं

उनकी केतलियाँ भी पुरानी नहीं होती
वैसे वो नयी भी नहीं थी कभी

बाहर बैठा मिल ही जाएगा वो योगी सा तटस्थ भाव लिए
जो बचपन में भी बूढा ही दिखता था
जिसका नाम वार महिना तिथि
या फिर अमावस पुन्वासी सा होगा

जाने क्यूँ मन की ज़मीन से होते हैं ये छोटे शहर
इनके भीतर कुछ बदलता ही नहीं
बाहर लाख बहती रहे बदलाव की बयार

1 comment:

  1. ek dum se mere gaon ke chowk pe baithe purnmaasi mahto ke chai ki dukan ki yaad taaji ho gayeee :)

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